Skip to main content

Posts

Showing posts with the label खाना खजाना

जस भैया के दाल पराठे के बड़े-बड़े नेता भी मुरीद

इन दाल-पराठे के पूर्व CM मोतीलाल वोरा भी थे मुरीदः आंच और मसालों में छिपा टेस्ट का राज; कई ढाबों पर देखकर सीखी रेसिपी बुजुर्ग कहते हैं 'दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ'... लेकिन अगर दाल के साथ रोटी की जगह पराठे मिल जाएं तो.. वो भी जस भैया के हाथ के... तो मजा डबल हो जाता है। ये हम नहीं कह रहे हैं, यह कहना है, जस भैया के भोजनालय पर दाल-पराठा खाने आए ग्राहकों का। खरगोन जिले के बड़वाह में इंदौर-खंडवा हाईवे पर इंदिरा मार्केट में कुलदीप भोजनालय है। यह भोजनालय संचालक जसपाल सिंह भाटिया उर्फ जस भैया के नाम से पहचाना जाता है। हाईवे से गुजरने वाले लोग ढूंढते हुए यहां आते हैं। 54 साल पुराने छोटे से भोजनालय में आम से लेकर खास तक चाव से दाल-पराठे का लुत्फ उठाते मिल जाएंगे। इतना ही नहीं मप्र के पूर्व सीएम मोतीलाल वोरा, वरिष्ठ नेता बृजमोहन मिश्रा भी जस भैया के दाल पराठे के मुरीद थे। वहीं, प्रसिद्ध मिठाई कारोबारी भंवरीलाल मिठाईवाला के संचालक तो इनके नियमित ग्राहक हैं। 85 साल के जस भैया के दाल पराठे के मुरीद केवल इंदौर, खंडवा, उज्जैन, बुरहानपुर क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से आने वाले म...

केले के समोसे के लिए इतनी भीड़ रहती है कि 6दिन इंतजार के बाद खाने मिलता है

  3 घंटे में बिक जाते हैं 2500 पीस क्या आप जानते हैं समोसा ईरान से आया था। फारसी में इसे 'संबुश्क' कहते थे, लेकिन भारत आते-आते इसे समोसा कहा जाने लगा। आकार भी बदलकर तिकोना हो गया और स्टफिंग में मेवे की जगह आलू भरा जाने लगा। धीरे-धीरे समोसा लवर्स ने इतनी वैरायटी तैयार कर डाली कि आज पनीर समोसा, पिज्जा समोसा, चॉकलेट समोसा, मावा समोसा, चाऊमीन समोसा, तंदूरी समोसा... न जाने कितने तरह के समोसा बाजार में बिकने लगे हैं। आज राजस्थानी जायका में हम आपको समोसे की ऐसी ही एक खास वैरायटी से रूबरू करवाते हैं, जिसमें आलू नहीं डलता। कच्चे केले से इसका मसाला तैयार होता है। खास बात यह है कि ये समोसा सप्ताह में केवल एक ही दिन बनता है। खाने वालों को 6 दिन तक इंतजार करना पड़ता है। ये हैं कच्चे केले से बने समोसे। आप सोचेंगे भला समोसे में ऐसी क्या खास बात है? इसी की तलाश में हम जयपुर के टोंक रोड स्थित कीर्ति नगर पहुंचे। यहां की आनंदम कैटर्स शॉप पर ज्यादातर लोगों की भीड़ यही कहती नजर आई। भाई साहब - 5 पैक कर देना। अंकल 8 पैक कर दीजिए, विद चटनी। खुशकिस्मती से उस दिन संडे था। केवल इसी दिन यहां कच्चे केले के...

खाने में स्मोकी फ्लेवर लाने के लिए तड़का लगाने या बघारने से लेकर तंदूर, ग्रिलिंग और बारबेक्यू जैसे तरीके बना रहे दिल को बीमार

खाने में स्मोकी फ्लेवर लाने के लिए तड़का लगाने या बघारने से लेकर तंदूर, ग्रिलिंग और बारबेक्यू जैसे तरीके इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। बैंगन भर्ता, लिट्टी-चोखा और धुंआर दाल से लेकर रायता समेत तमाम सब्जियों व मीट तक का स्वाद और फ्लेवर बिना धुएं के नहीं आता। अब तो तंदूरी चाय भी पॉपुलर है और गैस के जरिए कॉकटेल को भी स्मोकी फ्लेवर दिया जा रहा है। 'धुआंरा' का अर्थ है धुआं लगाना, जिसे धूनी और धुंगार भी बोलते हैं। आग जलाकर तपस्या में लीन हो जाने पर बोला जाने वाला 'धूनी रमाने' वाला मुहावरा भी ऐसे ही बना है। लेकिन, खाने में धुएं का गलत तरीके से इस्तेमाल सेहत पर भारी पड़ सकता है। न्यूट्रिशनिस्ट निधि अग्रवाल बताती हैं कि देश के हर हिस्से में ऐसे कई खास व्यंजन बनाए जाते हैं, जिनमें स्वाद ही धुएं से आता है। अवध की बिरयानी, कोरमा, कबाब, दम पुख्त जैसे व्यंजन तैयार करते वक्त उन्हें खासतौर पर धुआंरा जाता है। बिहार में लिट्टी-चोखा में धुआं न लगे तो उसे खाने का मजा ही किरकिरा हो जाएगा। नॉर्थ ईस्ट में तो राइस वाइन बनाने और मीट को प्रिजर्व करने के लिए भी धुएं का इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान म...

यूरोपीय यूनियन ने दी कीड़ों को इंसानी भोजन मानने की मंजूरी; कई देशों में झींगुर और कई दूसरे कीड़ों से बना आटा खिलाने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है

ट्यूरिन/ बरसात के दिनों में निकलने वाले झींगुर से अब स्वादिष्ट ब्रेड, पास्ता, बर्गर और प्रोटीन बनाया जा रहा है। इटली, चीन, वियतनाम, थाइलैंड सहित कई देशों में झींगुर और कई दूसरे कीड़ों से बना आटा खिलाने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। 10 लाख झींगुरों को रोज फूड आइटम में तब्दील करता है इटली का झींगुर फार्म भुनभुनाते झींगुरों को उबालना, सुखाना और फिर फूड आइटम में बदलना भारतीयों के लिए अजीब बात हो सकती है लेकिन इटली के सबसे बड़े झींगुर फार्म में यह रोज का काम है। यहां फार्म चलाने वाले इवान अलबानो के मुताबिक, झींगुरों से हम हल्का भूरा आटा बनाते हैं, जिसका इस्तेमाल पास्ता, ब्रेड, पैनकेक, एनर्जी बार और स्पोर्ट्स ड्रिंक बनाने में किया जाता है। यूरोपीय यूनियन ने दी कीड़ों को इंसानी भोजन मानने की मंजूरी हजारों साल से एशिया, अफ्रीका समेत दुनिया के कई हिस्सों में झींगुर, चींटी और कीड़ों को खाना आम बात रही है। अब इस साल की शुरुआत में यूरोपीय यूनियन ने भी इंसान के भोजन के लिए कीड़ों की बिक्री को मंजूर दे दी है। लेकिन यहां पर कीड़ों को प्रोसेस करके उनसे दूसरे किस्म के फूड आइटम बनाए जाने लगे हैं जो अपने आ...

16.40 करोड़ रुपए की लागत से बन रहे दुर्ग जिले का सगनी घाट पुल पहली बारिश में ही बह गया

दुर्ग/ छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले धमधा ब्लॉक के अंतर्गत 16.40 करोड़ रुपए की लागत से बन रहे ब्रिज के एक हिस्से का स्ट्रक्चर पहली बारिश में बह गया है। बुधवार सुबह जब लोग नदी का जल स्तर देखने गए थे तभी अचानक ब्रिज का स्ट्रक्चर नदी में समा गया। इतनी बड़ी घटना हो जाने के बाद भी मौके पर न तो पीडब्ल्यूडी का कोई अधिकारी पहुंचा न ही ठेकेदार। शाम को पीडब्ल्यूडी सेतू निर्माण की ओर से जारी एक पत्र में मामले पर सफाई दी गई। कहा गया कि ब्रिज के 15 वें स्पॉन के स्टेजिंग और सेंट्रिंग का ढांचा बहा है। शेष ब्रिज को नुकसान नहीं पहुंचा है।  लोग खतरे के बीच ब्रिज में चढ़कर नदी के बढ़े हुए जलस्तर को देख रहे थे। वहां सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे। जिस पार्ट का एप्रोच पुल बहा है वहां भी गुणवत्ता की काफी कमी देखने को मिली। ग्रामीण रोहित लोधी का कहना है कि पुल का निर्माण घटिया स्तर का हो रहा है। ठेकेदार और अधिकारी कभी मौके पर देखने नहीं आते हैं। यहां का जो मुंशी है वो अपनी मर्जी से काम कराता है। ठेकेदार ने कोई इंजीनियर नहीं रखा है, जो ब्रिज में हो रही तकनीकी कमियों को देख सके। ब्रिज की गुणवत्ता और मजबूती को लेक...

आम लेने से पहले कन्फ्यूज हो रहें हैं कि पता नहीं काटने के बाद कैसे निकलेंगे तो आम खरीदने के ये तरीके अपनाएं पाएंगे रसीले और मीठे आम

 गर्मियों को आम का मौसम भी कहा जाता है. शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा कि जिसे आम खाना पसंद नहीं होता है. लेकिन आम खरीदते वक्त अक्सर एक चीज को लेकर हम सभी कनफ्यूज हो जाते हैं. दरअसल, आम खरीदते वक्त अक्सर यह गलतियां कर देते हैं कि आम खट्टे हैं कि मीठे हैं. यह गलती सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि बुजुर्ग लोगों से भी गलती हो जाती है. आप कैसे मीठे आम का पता लगा सकते हैं. आम के ऊपरी हिस्से और डंठल की जोड़ को देखें आम खरीदने से उसके ऊपर के हिस्से को ध्यान से देखें.और उसके डंठल को देखें. फिर आम की गहराई को देखें. अगर आम का डंठल वाला प्वाइंड अगर अंदर की ओर धंसा हुआ है तो यह आम पका हुआ होगा और मीठा होगा. आम के निचले हिस्से को देखें आम को लें और इसके निचले हिस्से को देखें. अगर आम के निचले हिस्से पर काला या गहरा रंग या फिर सूखा स्किन नजर आए तो इसका साफ मतलब है कि यह ताजे पके हुए आम नहीं है. यह भले ही देखने में सुंदर लग जाए लेकिन खाने में यह मीठे नहीं होंगे. आम को सूंघ कर और छू कर देखें आप जब भी बाहर आम खरीदने जाते हैं तो आप को छू कर और उसे सूंघ कर भी पता लगा सकते हैं कि आम पके हुए है या नहीं. अगर आम को...

माइक्रोसॉफ्ट फाउंडर बिल गेट्स ने बनाई रोटियां, शेफ एटन बर्नथ ने दिए टिप्स; नरम रोटियां कैसे बनती है, गूंथा आटा फ्रिज में रखे या नहीं जानते हैं

माइक्रोसॉफ्ट फाउंडर बिल गेट्स का रोटी बनाने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। देखा तो होगा आपने। उनके साथ अमेरिकी शेफ एटन बर्नथ भी हैं। शेफ एटन बर्नथ बिल गेट्स को रोटियां बनाना सिखा रहे हैं। गेट्स चम्मच से आटा गूंथते हैं और फिर रोटिंया बेलते हैं। शेफ की रोटी तो गोल बनती है लेकिन गेट्स की थोड़ी लंबी। गोल और नरम रोटी बनाना भारत में किसी परंपरा से कम नहीं। तभी तो आज भी कई लोग शादी के लिए रिश्ते की बात शुरू होते ही लड़कियों से पूछते हैं… ‘क्यों बेटा रोटी बनानी आती है न।’ बहू भले ही साइंटिस्ट क्यों न हो, भारतीय ससुराल में एक न एक व्यक्ति को रोटी बनाने की चिंता हो ही जाती है। अगर रोटी बनानी आ रही है तब यह ताना मिलता है कि मुलायम नहीं है, गोल नहीं बनी, थोड़ी सी जल गई है। जरूरत की खबर में नरम रोटी बनाने की ट्रिक्स की बात करेंगे। रोटी पर घी लगाकर खाना हेल्दी है कि नहीं ये भी जानेंगे, डॉ निधी पांडे, डायटीशियन, भोपाल और शेफ निशा मधुलिका से। आज के जमाने में रोटी बनाना सिर्फ लड़कियों का काम नहीं इसलिए इस खबर को लड़के भी जरूर पढ़ें। सवाल: गेहूं के आटे से बनी एक रोटी में कितनी कैलोरीज होती हैं...

बांस की सब्जी कैंसर के खतरे को कम करने में है सहायक, उंगलियां चाटते रह जाएंगे इसकी सब्जी खाकर

   जगदलपुर/ छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के ग्रामीण तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं। कम संसाधनों में भी बेहतर जीवन जीने की कला यहां के ग्रामीणों में देखी जाती है। बस्तर क्षेत्र अपने खान-पान, पहनावा और रहन-सहन के लिए काफी प्रसिद्ध है। खाने की बात करें तो इसके लिए भी यह अन्य जगहों से बहुत भिन्न है। स्वाद के साथ ही यहां के आहार स्वास्थय के लिए भी बहुत फायदेमंद होते हैं। लेकिन आज हम आपको बस्तर में खाई जाने वाली एक खास तरह की सब्जी में बताने जा रहे हैं। यह है बांस करील की सब्जी। बस्तर में पहले जंगलों की सब्जियों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। यहाँ के जंगलों में बहुत से ऐसे पौधे मिलते हैं जिन्हे आदिवासी सब्जियों के रूप में उपयोग में लाते हैं। बांस का पौधा इनमें से एक है। इसे बास्ता या करील भी कहते हैं। यह बांस का अंकुरित पौधा होता है जिसे बस्तर के लोग बड़े ही चाव से सब्जी बनाकर खाते हैं। बांस के ये नए पौधे (बास्ता), सफेद रंग के होते हैं। हर साल ये पौधे जून से अगस्त के महीनों में आते हैं। कई पोषक तत्व बास्ता( बांस के अंकुर)में विटामिन जैसे विटामिन ए, विटामिन ई, विटामिन बी 6, थिया...