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बिना आंख वाले शिक्षक पढ़ाने में है नंबर वन

सरकारी स्कूलों में घटते एडमिशन के बीच रतनपुर के एक प्राथमिक स्कूल ने सकारात्मक मिसाल पेश की है। गांधी नगर स्थित स्कूल में इस साल 17 प्रतिशत ज्यादा बच्चों ने दाखिला लिया है। इसके पीछे स्कूल के प्रधानपाठक मुकुटमणि तिवारी का पूर्ण समर्पण है, जो पिछले 13 वर्षों से दृष्टिबाधित होने के बावजूद नियमित रूप से स्कूल पहुंचकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा है कि स्कूल में कक्षा-2 में पढ़ने वाले बच्चे 25 तक का पहाड़ा एक सांस में बता देते हैं। प्रधानपाठक तिवारी अब सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए मिसाल बन चुके हैं। उन्हें इस साल उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान से भी नवाजा गया है।

शिक्षक मुकुटमणि तिवारी ने बताया कि 2011 तक वे बिल्कुल स्वस्थ थे। इसी बीच उन्हें आंखों में समस्या महसूस हुई और कुछ दिनों के भीतर ही आंखों की करीब 80-90 प्रतिशत रोशनी चली गई। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि उनकी आंखें अब ठीक नहीं हो सकती। आंखों से देख नहीं पाने के कारण शुरुआत में उन्हें स्कूल जाने व पढ़ाने में समस्या हुई, लेकिन उन्होंने पढ़ाना नहीं छोड़ा। उन्होंने बताया कि वे बालवाड़ी के साथ पहली व दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाते हैं। बोर्ड में लिखा अक्षर थोड़ा-थोड़ा नजर आता है, इसलिए वे पहाड़ा व गणित पढ़ाने बोर्ड पर स्कूल में पदस्थ एक और शिक्षक से लिखवा लेते हैं। वहीं पुस्तक पढ़ाने में बच्चों से कुछ मदद ले लेते हैं।

सीएम विष्णुदेव साय ने किया सम्मानित

दृष्टिबाधित होने के बावजूद बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाने के लिए इस साल तिवारी को उत्कृष्ट शिक्षक के सम्मान से नवाजा गया है। उन्हें बिलासपुर में हुए मुख्य समारोह में सीएम विष्णुदेव साथ ने सम्मानित किया है।

कतार में खड़ा कर पढ़ाते हैं, जो बच्चे कमजोर वे रहते हैं आगे

प्रधानपाठक तिवारी ने बताया कि उनके स्कूल में पहली में पढ़ने वाले 70 से 80 प्रतिशत बच्चे दूसरी की किताबें पढ़ लेते हैं। साथ ही वे 25 तक का पहाड़ा फरटि से बोलते हैं। उन्होंने बताया कि वे बच्चों को लाइन में खड़ा कर पढ़ाते हैं। साथ ही जो बच्चा सबसे कमजोर होता है वह कतार में आगे रहता है और हर गलती पर उसे दोबारा पढ़ाया जाता है। इससे पढ़ने के दौरान होने वाली गलतियां सुधरती हैं और उसे हमेशा के लिए याद भी हो जाता है।

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