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पर्यावरण एनओसी में फर्जीवाड़ा


खुद ही टीपाखोल डैम को डुबाने में जुटा विभाग, पर्यावरणीय अनुमति में छिपाई जानकारी

टीपाखोल डैम के डूब क्षेत्र से महज 50 मीटर पर क्वाट्र्जाइट खनन के लिए खनिपट्टा स्वीकृत कर लिया गया। खनिज विभाग, राजस्व विभाग और जल संसाधन विभाग को मालूम भी है, लेकिन पर्यावरणीय अनुमति में इसका जिक्र तक नहीं। यंगटी इंटरप्राइजेस की वजह से टीपाखोल डैम पर खतरा मंडराने लगा है।

यंगटी इंटरप्राइजेस को क्वाट्र्जाइट खदान के लिए टीपाखोल में सरकारी भूमि खसरा नंबर 108/1 रकबा 10.4270 हे. में से 6.175 हे. पर खनिपट्टा स्वीकृत किया गया। इस प्रक्रिया में सारे नियम धरे के धरे रह गए।

जिन पर पारदर्शी तरीके से काम करने की जिम्मेदारी थी उन्होंने ही सरकार को अंधेरे में रखा। सरकारी जमीन को चंद लाख रुपए सालाना राजस्व के लिए खदान में बदल दिया। 1975 से मौजूद इस डैम के बारे में 2009 में मिली पर्यावरणीय स्वीकृत में जानकारी नहीं दी गई। ऐसा भी नहीं है कि किसी ने जांच नहीं की। प्रतिवेदन में साफतौर पर यंगटी इंटरप्राइजेस संचालक दुर्गा दिनोदिया को बचाने के लिए अधिकारियों ने सच को दरकिनार कर दिया गया।

किसी भी सिंचाई डैम के इतने नजदीक खनिपट्टा स्वीकृत करने के लिए नियम सख्त हैं। रायगढ़ तहसील के टीपाखोल में यंगटी इंटरप्राइजेस को 50 साल के लिए खनिपट्टा स्वीकृत किया गया है। वर्ष 2003 में माइनिंग लीज की मंजूरी सत्यनारायण दिनोदिया के नाम पर थी। तब केवल 30 साल के लिए 2033 तक स्वीकृति मिली थी। 30 जून 2006 में यह माइनिंग लीज दुर्गा दिनोदिया के नाम पर ट्रांसफर की गई।

इस खनिपट्टा स्वीकृति में कई पोल हैं जिसको एक-एक करके उजागर किया जाएगा। 2006 में सहायक खनिज अधिकारी, कार्यपालन अभियंता जल संसाधन विभाग और तहसीलदार रायगढ़ ने एक प्रतिवेदन दिया। इसमें बताया गया है कि खनिपट्टा के पश्चिम में बांध का ऊपरी क्षेत्र, दक्षिण में बांध की मेंड़ और पूर्व में जंगल है।

यह भी बताया गया है कि लीजधरक गन पाउडर का इस्तेमाल कर ब्लास्ट करता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बांध का डूब क्षेत्र खदान से 50 मीटर की दूरी पर है। बांध की दूरी सिर्फ 250 मीटर है। इसके बावजूद तीनों अधिकारियों ने इसे मंजूरी देने का प्रस्ताव दिया।

2006 में बताया था, 2009 में छिपाया यंगटी इंटरप्राइजेस को मिली पर्यावरणीय मंजूरी इसलिए गलत है क्योंकि इसमें सारे तथ्य छिपाए गए हैं। 2009 में जब खदान की कैपेसिटी 14175 टन प्रतिवर्ष बढ़ाई गई तो ईसी मंजूर किया गया। सरकार ने इसे बी-2 कैटेगरी का माना और ईआईए व जनसुनवाई के बिना ही इन्वायरमेंट क्लीयरेंस देने की सिफारिश की। कैपेसिटी बढ़ाने के लिए किए गए आवेदन में

बताया कि माइनिंग लीज क्षेत्र के दस किमी रेडियस में कोई अभ्यारण्य, नेशनल पार्क या ऐतिहासिक स्थल नहीं हैं। उर्दना रिजर्व फॉरेस्ट करीब 100 मीटर दूर दिखाया गया। जल स्रोतों के रूप में केवल बरसाती नाले होने व जानकारी दी गई। जबकि इसके पहले ही संयुक्त जांच प्रतिवेदन में बांध को 250 मीटर दूर बताया गया है। टीपाखोल डैम 1975 से मौजूद है। तो क्या अधिकारियों को भी नहीं दिखा।


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