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बच्चों का भविष्य पेरेंट्स की भाषा से भी तय होता है

अपने बच्चों से कभी न कहें ये 5 वाक्यः पेरेंट्स की भाषा से तय होता बच्चे का भविष्य, वह बनता कॉन्फिडेंट या कमजोर

'तुम रोने वाले बच्चे हो,' 'तुम हर वक्त टैंट्रम्स दिखाते रहते हो' या फिर 'तुम ठीक तो हो न।' इस तरह के वाक्य मां-बाप की जुबान से अक्सर सुनने को मिलते हैं। वे अकसर किसी ने किसी बात पर बच्चे पर इस तरह की टिप्पणियां कर रहे होते हैं।

लेकिन इंग्लैंड की ससेक्स यूनिवर्सिटी में बच्चों के मनोविज्ञान पर हुई एक रिसर्च बताती है कि पेरेंटिंग के दौरान मां-बाप का बच्चों की भावनाओं से उलट भाषा या धमकी भरा रवैया बच्चे के भविष्य को खतरनाक रूप से प्रभावित कर सकता है।

जाने-माने चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट चिकी मूरमैन की एक किताब है- 'पेरेंट टॉक।' इस किताब में मूरमैन लिखते हैं कि मां-बाप अपने बच्चे से किस तरह बात करते हैं, इसका बच्चे की पर्सनैलिटी और उसके भविष्य पर बहुत गहरा असर पड़ता है। बच्चों के जीवन को संवारने या उसे बिगाड़ने में पेरेंट्स की भाषा बहुत अहम भूमिका निभाती है। मूरमैन पेरेंटिंग में सही भाषा के इस्तेमाल को सबसे जरूरी बताते हैं।


इसी तरह सेल्फ मोटिवेशन वेबसाइट 'हैक स्पिरिट' की एक रिपोर्ट उन वाक्यों की एक लिस्ट बताती है, जो आमतौर पर पेरेंट्स इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ऐसा करना बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास के लिए ठीक नहीं है।


पेरेंटिंग में इतनी अहम क्यों है भाषा

अपनी किताब में चिकी मूरमैन लिखते हैं कि बच्चों के लिए पेरेंट्स और उनका बिहेवियर आदर्श होता है। कम उम्र में बच्चे अपने पिता को दुनिया का सबसे ताकतवर शख्स और मां को सबसे अच्छी महिला मानते हैं। इनके बारे में बच्चों के मन में आदर्श सोच होती है।

ऐसे में अगर मां-बाप बच्चों को किसी चीज के लिए कहते या रोकते हैं तो इसी से बच्चे उस चीज के अच्छे या बुरे होने की सीख लेते हैं। अगर कोई मां अपने बच्चे से यह कहे कि 'तुरंत रोना बंद कर दो' तो भले ही बच्चा रोना बंद न करे, लेकिन मन-ही-मन वह जरूर सोचेगा कि रोना गंदी बात है।

ऐसी स्थिति में वह आगे से अपनी भावनाओं को जाहिर कर पाने या रो पाने में कठिनाई महसूस करेगा, वह अंदर-ही-अंदर घुटने लगेगा। यहां अनजाने में मां की भाषा बच्चे के मनोविज्ञान को काफी गहराई से प्रभावित कर जाती है।

'तुम ठीक हो' की जगह बच्चों से पूछें उनकी प्रॉब्लम

हैक स्पिरिट की एक रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों के उदास या परेशान दिखने पर 'तुम ठीक तो हो, तुम्हें ये क्या हो गया है, तुम्हारी हरकत बदली बदली सी क्यों है' जैसे सवाल उनकी परेशानी बढ़ा सकते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों के मन में ये सोच आती है कि अपनी भावनाओं को दिखाना गलत है।

चाइल्ड साइकोलॉजी कहती है कि बच्चों को परेशान देखकर सीधे ठीक या खराब के नतीजे पर पहुंचने से पहले उनकी फीलिंग्स को एक्नॉलेज यानी स्वीकार करना जरूरी है। अगर बच्चा परेशान है या रो रहा है तो सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि बच्चे का रोना यूं ही नहीं है। उसकी कोई वजह है।

मां-बाप इन वजहों को जानने की कोशिश करें और बच्चे से उसकी परेशानियों के बारे में पूछें तो आगे भी वह उनके सामने अपनी भावनाओं को आसानी से जाहिर कर पाएगा। एक बार मां-बाप बच्चे की फीलिंग्स, उसकी पसंद-नापंसद समझ लें तो उनके भविष्य को दिशा देना आसान हो सकता है।

दूसरी ओर, समझने से पहले ही बच्चों की भावनाओं के बारे में कमेंट पास करना या निर्णय सुनाना उन्हें अपनी फीलिंग्स दबाने के लिए मजबूर कर सकता है।


बच्चे और पेरेंट्स के बीच न हो कम्युनिकेशन गैप

चिकी मूरमैन की मानें तो बिना किसी कम्युनिकेशन गैप के खुलकर होने वाली बातचीत हेल्दी पेरेंटिंग की निशानी है। जब पेरेंट्स और बच्चे अपने विचारों, भावनाओं और इच्छाओं के बारे में खुलकर बातचीत नहीं करते या माता-पिता बच्चों की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा में बात करते हैं तो ऐसी स्थिति उनके बीच गलतफहमियों को जन्म दे सकती है।

इससे माता-पिता और बच्चों के बीच के रिश्ते में दरार आ सकती है, जिसे सुधारना मुश्किल हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि मां-बाप और बच्चों के बीच बातचीत हो और उसकी भाषा भी अनुकूल हो। इसके लिए शब्दों और वाक्यों के चयन पर काफी गंभीरता से विचार करने की जरूरत होती है।

बच्चों के साथ सहज संवाद और उनकी भावनाओं के प्रति अच्छी समझ विकसित करने के लिए चिकी मूरमैन अपनी किताब में पेरेंट्स को ये टिप्स देते हैं-

बच्चों के मन से सोचें पेरेंट्स- चिकी मूरमैन के मुताबिक एडल्ट ह्यूमन साइकोलॉजी और चाइल्ड साइकोलॉजी में जमीन-आसमान का फर्क होता है। ऐसे में बच्चों का मन पढ़ने के लिए मां-बाप का इंपैथी के साथ बच्चों की तरह सोचना जरूरी है। अगर मां-बाप बच्चों की नजर से उनकी दुनिया और उनकी परेशानियों को देखें तो उसका हल भी काफी आसान हो सकता है।

धैर्य और लचीला रवैया- संभव है कि पेरेंट्स घर में बच्चों के लिए कुछ नियम बनाएं। लेकिन 7 साल से कम उम्र के बच्चों की परवरिश के दौरान नियमों को लेकर सख्त होना कम्युनिकेशन गैप की वजह बन सकता है। सामान्य स्थिति में ये नियम नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। लेकिन जब बच्चा किसी वजह से परेशान या उदास है तो मां-बाप को धैर्य के साथ लचीला रवैया अपनाते हुए बात करने की कोशिश करनी चाहिए।

रोकने से ज्यादा बताना जरूरी- 'ये मत करो, ऐसा करने से नाराज हो जाऊंगी, ऐसा करोगे तो डांट पड़ेगी', सामान्य स्थिति में ऐसे निगेटिव कम्युनिकेशन से बचना चाहिए। इसकी जगह 'ये करो तो अच्छा होगा, अच्छे बच्चे ऐसा किया करते हैं, हमें यह करना चाहिए' जैसे पॉजिटिव वाक्यों का इस्तेमाल करें। बच्चे को क्या नहीं करना चाहिए की जगह 'क्या करना है' की सीख ज्यादा जरूरी है।

बच्चों के साथ बातचीत में हो सेंस ऑफ ह्यूमर- मां-बाप और बच्चों के बीच कम्युनिकेशन गैप खत्म करना और भावपूर्ण संवाद में ह्यूमर काफी मददगार साबित हो सकता है। हैक स्पिरिट की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर पेरेंट्स अपने एडल्ट और सीरियस होने के भाव को किनारे रख बच्चों से बात करें, ह्यूमर दिखाएं तो बच्चे अपनी भावनाओं को खुलकर जाहिर कर पाते हैं।

यहां एक बात और समझनी जरूरी है, जिसके बारे में डॉ. गाबोर माते अपनी किताब 'होल्ड ऑन टू योर किड्स' में विस्तार से लिखते हैं कि बच्चे और पेरेंट के बीच रिश्ते की इमोशनल जिम्मेदारी पूरी तरह एडल्ट पेरेंट के कंधों पर ही होती है। हम बच्चे से एक वयस्क की तरह चीजों को समझने और इमोशनली मैच्योर तरीके से रिएक्ट करने की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन हमारे आसपास बहुत सारे पेरेंट्स ऐसा करते हैं, जो कि बच्चे के मनोविज्ञान और मानसिक विकास को डैमेज कर सकता है।

ये समझना सिर्फ पेरेंट्स का काम है कि उनकी भाषा बच्चे पर असर डाल रही है। बच्चे का काम ये समझना नहीं है कि वह सिर्फ माता-पिता के दिशा-निर्देशों और आदेशों के हिसाब से आचरण करे।

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