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डेढ़ साल की उम्र से पोलियो वायरस की गिरफ्त में यशवंत, पिता कहते थे प्राइमरी टीचर बन जाए वही बहुत है

‘80 के दशक की बात है। उस वक्त पोलियो का वायरस बहुत तेजी से फैला हुआ था। आज की तरह पोलियो ड्रॉप नहीं था। बचने के लिए बच्चों को इंजेक्शन लगाए जा रहे थे, लेकिन वो उतना सक्सेसफुल नहीं था। 1986 में मेरा जन्म हुआ। पूरे परिवार में मैं पहला लड़का था। अपने घर में भी चार बहनों के बाद मेरा जन्म हुआ था। परिवार में खुशी का इस कदर माहौल था कि लोग हमेशा मुझे गोद में लिए रहते थे। मैं हर किसी के करीब था।

मेरी उम्र तकरीबन डेढ़ साल रही होगी। तभी मैं पोलियो वायरस की गिरफ्त में आ गया। कमर से नीचे का पूरा हिस्सा पैरालाइज्ड हो गया। नीचे से शरीर सूखने लगा। मैं किसी काम का नहीं बचा। घर में मातम फैल गया।’

मैं अभी दिल्ली के आरके पुरम एरिया में हूं। सामने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) में पिछले 7 साल से कार्यरत फिंगरप्रिंट इंस्पेक्टर जशवंत सिंह यादव एक पैर में आर्टिफिशियल लेग सपोर्ट लगाते हुए बचपन में हुए हादसे के बारे में बता रहे हैं।


'यदि मैं शुरू में ही मान चुका होता कि कुछ नहीं कर पाऊंगा, तो शायद टीचर ही रहता और आपको अपनी कहानी नहीं बता रहा होता।’

जब यशवंत मुझे अपने पुराने दिनों में लेकर चलते हैं, तो उनके चेहरे पर बिल्कुल भी निराशा नहीं झलकती। न कोई मलाल, न ही शिकन। ऐसा लग रहा मानो वो उन परिस्थितियों को मात देकर बहुत आगे निकल चुके हैं।

जशवंत कहते हैं, ‘आर्टिफिशियल लेग सपोर्ट पहन लेता हूं, तो चलने में थोड़ी आसानी होती है। अपनी लाइफ को आसान बनाने के लिए मैंने समय के मुताबिक टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया है।

कुछ दिन पहले ही मेरे स्पाइन की हड्डी टेढ़ी हो रही थी। डॉक्टर ने एक बेल्ट दिया है। अब इसे भी पहनना पड़ता है।’

जब मैं इंस्पेक्टर जशवंत के यहां पहुंचता हूं, तो दोनों बच्चे खेल रहे होते हैं। पत्नी पूनम साफ-सफाई कर रही हैं। कमरे की दीवार पर फैमिली फोटो लगी है। जिसमें उनके दादा-दादी के साथ मम्मी-पापा भी शामिल हैं। मैं उस तस्वीर को देखने लगता हूं।

जशवंत के पिता को लगता था कि उन्हें टीचर बन जाना चाहिए। जशवंत खुश हैं कि उन्होंने अपने जीवन में इससे बड़ा अचीव किया।

जशवंत पलटकर सवाल करते हैं, 'आप भी दूसरों की तरह यह तो नहीं सोच रहे कि एक दिव्यांग का इतना फलता-फूलता परिवार कैसे है? बेटा-बेटी, पत्नी है, वो भी बिल्कुल फिट।

बुरा मत मानिएगा, दरअसल ज्यादातर लोगों को लगता है कि किसी दिव्यांग या फिजिकली चैलेंज्ड लोगों का कोई यदि लाइफ पार्टनर होगा भी, तो वो भी फिजिकली चैलेंज्ड ही।'

शादी कब हुई?

'2013 में। मैं इस मामले में खुद को भाग्यशाली मानता हूं। घरवालों की मर्जी से हम दोनों की शादी हुई थी। हालांकि, हम दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते थे।’

आप लोग दिल्ली से ही हैं?

‘नहीं, हम दोनों ही झांसी से हैं। मास्टर कम्प्लीट करने के बाद दिल्ली आया था।’

‘ऐसी स्थिति में पूरी पढ़ाई और फिर गवर्नमेंट जॉब…।’ मैं जशवंत से पूछता हूं।

थोड़ा ठहरते हुए जशवंत बताते हैं, ‘डेढ़ साल की उम्र में पैरालाइज्ड। घर वालों को तो कुछ सूझ भी नहीं रहा था कि करना क्या है। कहां दिखाना है। किस डॉक्टर को दिखाना है।

पापा टीचर थे। गांव के लोग, रिश्तेदार… जहां जो बोलते थे- वहां दादा, पापा मुझे दिखाने के लिए ले जाते थे। अब कोई नॉर्मल बीमारी होती, तो शायद ठीक भी हो जाता, लेकिन ये तो पोलियो था।

आखिर में जब मेरी उम्र 7 साल हुई, तो विशाखापट्‌टनम में इलाज शुरू हुआ। उस समय उत्तर प्रदेश के झांसी से दक्षिण राज्यों में जाना बहुत मुश्किल था। भाषा की भी दिक्कत थी। दक्षिणी राज्यों में अब तो लोग थोड़ा बहुत हिंदी बोल भी लेते हैं।

उस वक्त तो इन राज्यों में हिंदी का चलन बिल्कुल भी नहीं था। मेरे पापा-दादा अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे। जब भी घरवाले मुझे इलाज के लिए विशाखापट्‌टनम लेकर जाते, साथ में किसी ऐसे रिश्तेदार को लेकर जाते, जो इंग्लिश बोलते थे।

अंत में मेरा एक हॉस्पिटल में ऑपरेशन हुआ। सर्जरी के बाद डॉक्टर ने कहा कि कहीं भी, किसी भी डॉक्टर को दिखा लो, स्थिति यही रहेगी। पूरी जिंदगी ऐसे ही जीना पड़ेगा। जितना जल्दी परिस्थिति को स्वीकार कर लो, उतना अच्छा।’

इकलौता बेटा और ये सिचुएशन?

इंस्पेक्टर जशवंत हंसते हुए कहते हैं, ‘घर में पढ़ने-लिखने का माहौल था। मैं दादा जी के सबसे नजदीक था। इलाज के लिए वही मुझे ले जाते थे। पापा को तो उतनी छुट्टी नहीं मिल पाती थी।

पापा का कहना था कि किसी भी तरह से थोड़ा-बहुत पढ़ लो। प्राइमरी स्कूल में टीचर की नौकरी लग जाएगी। खेती-बाड़ी थी ही, जीवन कट जाएगा। इधर मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। मुझे यकीन था कि पढ़ाई ही एक ऐसा हथियार है जो मुझे दूसरों से आगे बढ़ने में मदद कर सकता है। फिजिकली तो मैं किसी से जीत नहीं सकता था। अब बस दिमाग से जीतना है।'

जशवंत एक किस्सा सुनाते हैं- 'शुरुआत में मैं हताहत होता था, जब देखता था कि बच्चे खेलने के लिए जा रहे हैं और मैं बेड पर लेटा हुआ हूं। आसपास के लोग ओछी नजरों से देखते थे। बेचारा, असहाय, लाचार… कहते थे।

विशाखापट्‌टनम के दिनों की बात है। मेरा ऑपरेशन हुआ था। पड़ोस की एक दादी मुझे देखने के लिए आईं। मुझे देख वो कहने लगीं- हाय ! कैसे इस तरह से पूरी जिंदगी कटेगी। इससे अच्छा होता कि इसे भगवान उठा लेते। मर ही जाता।

अब आप बताइए कि जिस बच्चे को लोग बोलते थे कि जिंदगी में क्या करेगा। जीने से अच्छा होता कि मर जाता… वो आज इंस्पेक्टर बन गया। इतना ही नहीं, मेरी ये छठी नौकरी है। इससे पहले भी मैं केंद्र सरकार के 5 अलग-अलग संस्थानों में काम कर चुका हूं।’

जशवंत के साथ पूनम की शादी घरवालों ने तय की थी। 2013 में दोनों की शादी हुई। दोनों एक दूसरे को पहले से जानते थे।

कहते-कहते जशवंत हंसने लगते हैं। कुछ देर बाद कहते हैं, ‘इसी का नाम जिंदगी है। आप ही बताइए, कहां पापा चाहते थे कि प्राइमरी स्कूल का टीचर भी कम-से-कम बन जाएगा, तो जिंदगी कट जाएगी। मैं उन लोगों से आगे निकल गया, जो हर चीज से दुरुस्त थे।

पढ़ने में दिक्कत तो होती थी, लेकिन इसके अलावा मेरे पास कोई ऑप्शन भी नहीं था। मैं लेटे-लेटे किताबें पढ़ता रहता था। कमर में दर्द भी होने लगता था। बैठ नहीं सकता था, फिर भी मैं जैसे-तैसे पढ़ता रहता था।

झांसी से बैचलर कम्प्लीट करने के बाद मैं जब बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर करने कानपुर गया तो घरवालों को सबसे अधिक चिंता थी कि मैं खाऊंगा कैसे। रहूंगा कैसे। कॉलेज जाऊंगा कैसे…।

यहां दोस्तों ने काफी मदद की। उस वक्त तो कॉलेज में न रैंप होता था, न लिफ्ट। मुझे याद है- तीसरे फ्लोर पर मेरी क्लास होती थी। दोस्त मुझे कंधे से पकड़कर ऊपर ले जाते थे।

मुझे पढ़ने के लिए विदेश जाने का मन था। PhD के लिए एक फॉरेन यूनिवर्सिटी में एडमिशन भी हो गया था, लेकिन घरवालों ने भेजने से इनकार कर दिया। उनकी यहां भी वही चिंता थी कि एक तो पहले से पैरालाइज्ड है, ऊपर से विदेश जाने पर कुछ हो गया, तो फिर क्या होगा। एक ही बेटा…।’

जशवंत शूटिंग के अपने पैशन को फॉलो करने के साथ अब दिव्यांग लोगों के लिए भी काम करते हैं। उन्हें मोटिवेट करते हैं ताकि वो खुद की बदौलत कुछ कर पाएं।

जशवंत कहते हैं, ‘मैंने आज तक कभी प्राइवेट नौकरी नहीं की। पता था कि फिजिकली चैलेंज्ड हूं, तो वो अहमियत नहीं मिलेगी, जो दूसरों को मिलती है। सबसे पहले मैंने 2009 में सीनियर रिसर्च फेलो के तौर पर ICAR जॉइन किया था।

इस तरह से मैंने केंद्र सरकार के अलग-अलग 5 संस्थानों में काम किया। 2017 में NCRB में बतौर सब-इंस्पेक्टर जॉइन किया था।’

बातचीत के बीच अचानक जशवंत कहते हैं, ‘चलिए आपको शूटिंग एकेडमी लेकर चलता हूं।’

हम दोनों नजदीक के एक शूटिंग रेंज में चलते हैं। साथ में इसके पीछे का किस्सा जशवंत बता रहे हैं। कहते हैं, ‘बचपन से लेकर अब तक तो मैंने कोई गेम खेला नहीं। बस सपने देखता था। बुंदेलखंड में आपको हर घर में एक बंदूक दिखेगी।

मैं फिजिकली चैलेंज्ड हूं, इसलिए कभी बंदूक चलाने को नहीं मिली। 2019 में मेरे साथ एक घटना घटी। वॉशरूम से निकलने के दौरान मेरा पैर फिसल गया और मैं गिर गया। एक तो पहले से पैरालाइज्ड, ऊपर से पैर टूट गया। कई महीनों तक बिस्तर पर पड़ा रहा। पत्नी पूनम 7 महीने की प्रेग्नेंट थी। वो अकेले डॉक्टर के यहां जाती थीं।

जब ठीक हुआ, तो लगा कि अब अपना पैशन फॉलो करना चाहिए। टूरिज्म के नाम पर भी मेरा मेडिकल टूरिज्म ही चलता रहा। मैंने शूटिंग सीखनी शुरू की। कुछ महीने बाद ही उत्तर प्रदेश स्टेट लेवल पर होने वाले शूटिंग कॉम्पिटिशन में भाग लिया और गोल्ड मेडल जीता।'


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